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Showing posts from 2017

जिसकी आरज़ू लेके चले थे ये वो सहर तो नहीं

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़िदा सहर वो इंतज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं - Faiz Ahmed Faiz जिसकी आरज़ू लेके चले थे ये वो सहर तो नहीं  है जिसका माज़ी बेहद पुरनूर ये वो शहर तो नहीं दिल की ज़रखैज़ ज़मीन बरसों से बंजर है घुल गया रगों में लहू के साथ ज़हर तो नहीं आज फिर मौलवी परचम लेके निकले है अगली नस्लों पे था इन्ही का असर तो नहीं बरसों बाद वो एक ज़ख्म आज भी दहकता है मरहम लगाने में रह गई बाकी कोई कसर तो नहीं खाने को हवा रहने को सड़क ओढ़ने को 'आकाश' सारा जहाँ हमारा हो ये वो डगर तो नहीं। दाग़ = Freckle शब-गज़िदा = Injured by night सहर = Dawn माज़ी = Past पुरनूर = Filled with light ज़रखैज़ = Fertile मौलवी = Religious scholars परचम = Flag

बरसों पहले एक सौदा किये

बरसों पहले एक सौदा किये बड़ा नुकसान हुआ क्या किये   एक इल्म जिसमें उलझे रहे एक इल्म जिसका नशा किये   शब - ओ - रोज़ वक़्त के पाबंद फुरसत - ए - गुनाह को तरसा किये   गैर ऐसे जो क़ाइल हुए यार ऐसे जो टोका किये   न दीवाने हुए न होशियार मुकम्मल एक काम भी ना किये   नाकामियां आस्तीन खिंचती रही   हौसला मंज़िल की ओर ढकेला किये     ये   मलाल की लौट नहीं सकते 'आकाश'  ये राहत कि आग़ाज़ - ए - इल्म बरपा किये ।।   इल्म = knowledge, talent, expertise शब - ओ - रोज़ = day and night  पाबंद = bound फुरसत - ए - गुनाह = freedom to sin क़ाइल = convince मुकम्मल = complete आस्तीन = sleeve मलाल = regret आग़ाज़ - ए - इल्म = beginning of expertise afresh बरपा = happen 

काश ऐसा होता ।

होती ऐसी जगह कि  घास का बिस्तर होता  आसमान की चादर होती  न रोज़गार का झमेला होता  न कामयाबी की होड़ होती एक घर होता जिसे रोशन सवेरा करता एक कमरा होता जो हमसे बात करता होता एक बगीचा जिसका तू बागबां होता एक दर होता जिसे देख मेरा इंतज़ार होता  शब जो बिखरती सितारों की रोशनी होती बादलोँ की ओट से चांदनी लोरी सुनाती रात से लंबी नींद होती नींद से लंबे ख्वाब होते ख्वाब जो हक़ीक़त में बेशक तमाम होते  कोई न तीसरा होता एक तुम होती एक मैं होता घंटो हँसना होता न फिक्र कोई न कोई वादा-ए-वफ़ा होता मेरा वक़्त सिर्फ तुम्हारा होता तुम्हारा शबाब सिर्फ मेरा होता तुम मेरी राज़दार होती मैं तुम्हारा एतबार होता  तेरे बगीचे का पौधा जब शजर की सूरत लेता धूप में तपे बूढ़े बदन को छाँव का ठंडा लम्स देता उसी शजर की बेल से झूलता हिंडोला होता जहाँ तेरी अघोष में रख के सर मैं दम तोड़ता। बागबां = Gardener शब = night ओट = from behind वादा-ए-वफ़ा = promise of faithfulness शबाब = beauty राज़दार = confidant एतबार = trust शजर = tree लम्स = t...

A dialogue with India - कभी आलोचक कभी कदरदान हूँ मैं - Inspired by Faiz Ahmed Faiz

The test of our progress is not whether we add more to the abundance of those who have much it is whether we provide enough for those who have little. - Franklin D. Roosevelt  कभी आलोचक कभी कदरदान हूँ मैं कैसा रिश्ता है तुझसे मेरा हैरान हूँ मैं बाप हूँ जिसे फक्र हैं तेरे मन में बसे लोकतंत्र पर उसी तंत्र से पैदा हुए कपूतों पर हैरान हूँ मैं माँ हूँ जिसे नाज़ हैं तेज़ी से बढ़ते तेरे कद पर जिस्म में फैली ग़िज़ायत की कमी पर हैरान हूँ मैं मुत्मइन औलाद हूँ बिगाड़ा जिसे तेरे लाड ने देख उसी माँ को करते बच्चों में फर्क हैरान हूँ मैं बेटी हूँ जो मेहफूस है हर सम्त मौजूद तेरी सेना से पल पल बेआबरू करते भाइयों पर हैरान हूँ मैं यार हूँ निसार जो तेरी गलियों पर ऐ वतन तेरी बेवफाई की लत पर हैरान हूँ मैं उम्मीदवार हूँ जिसे है यकीन सहर तेरे रुख पर बिखरने को है सियाह रात कितनी गहरी और तवील है हैरान हूँ मैं। आलोचक = critic कदरदान = one who knows value of कपूत = a bad son ग़िज़ायत की कमी = malnutrition मुत्मइन = satisfied...

आएंगे टेढ़े मोड़ रास्ते में कई मगर चलना तो होगा

आएंगे टेढ़े मोड़ रास्ते में कई मगर चलना तो होगा जब भी लगेगी ज़माने की   ठोकर संभलना तो होगा तुम नहीं बदलना चाहते न बदलो मगर यह तय   रहे ज़माना बदल रहा है और   हमें भी   बदलना तो होगा हर वक़्त सुनते है किसी की कामयाबी की खबर हमें भी आवारगी भूल खुदको   आज़माना   तो होगा मस्लहत को ढाल बना हम   जवान   तो हो गए लेकिन भोला बचपन जो  क़त्ल  हुआ   उसे तलाशना   तो होगा पर काट   सदियों कैद   रक्खा   पिंजरे   में इक चिड़िया को अब्र पे   बनाया उसने अपना मकान सराहना तो होगा सच है   असीम   ताकत होती है जहाज़ों की मगर बहर में छुपे है सेकड़ो तूफ़ान डरना तो होगा है कब ये मुम्किन   गुलिस्तां के सारे   फूल एकरंगी हो फिर भी है दिलों में क्यों ये ख़्वाहिश   सोचना तो होगा। आवारगी = free thinking मस्लहत = maturity अब्र = cloud असीम = infinite बहर = oc...

लोहारों की गली

गुज़रा जिस मोहल्ले में मेरे बाप का बचपन नाम है उसका लोहारों की गली खेला करते थे उसी गली के चबूतरों पर मैं और नन्हा अली हर्षोल्लास से मनाये है कई त्यौहार कभी ईदी कभी होली हो हिन्दू या मुसलमा दीप जले हर घर हर दिवाली अंदर आ न पाइ कभी कोई गाड़ी इतनी पतली है वो गली किराये की साइकिल पर ही फिरा करते थे में और नन्हा अली हर तीसरे दिन सुबहो आता था पानी मचती थी खलबली सर्द हफ़्तों में दो चार बार ही नहाते थे क्या किरोड़ीमल क्या मिर्ज़ा अली पीठ से पीठ टिकाये हर घर बरसो से खड़ा था गर्म रातों में छत ही पर सारा मोहल्ला सोता था किराणे की थी बस एक ही दुकान दुकान के ऊपर ही था जुगल का मकान वही पर मिला करते थे डबल रोटी और काजू बादाम पूरी गली में एक ही टेलीफोन हुआ करता था और टीवी आने को था स्कूटर लूना मोटरसाइकिल आ चुके थे और व्यव्हार में उदारपन सदियों से था भाटा कुल्फी बेचने हर दोपहर कुल्फीवाला आता था यकीं है मुझे गली ख़त्म होने से पहले उसका ठेला खाली हो जाता था नए ब्याहे जोड़े को छत पर बना एकांतमय कमरा दे दिया जा...

सच बोलो

सच बोलो भेद खोलो तेज़ चलो धीर धरो बीन बजे नाच देखो हामी भरो मन बेचो काज करो फल भोगो दर्द मिले दवा बनो प्रेम करो हट छोड़ो रट भूलो राह चुनो रिंद बनो दैर फूको                                                                                                लब खोलो ज़िंदा रहो।  धीर = patience हामी = nodding in feigned acceptance रिंद = free thinker, carefree, drunkard दैर = place of worship

एक तेरे होने से कई साल तक मैं बड़ा हुआ ही नहीं

एक तेरे होने से कई साल तक मैं बड़ा हुआ ही नहीं दो बार गुज़रा वो बचपन जो करोड़ो को मिला ही नहीं  बट रहे हैं क्यों धर्मों से इंसान क्यों न बटे कर्मों से इंसान मुकम्मल होगा कभी जहाँ ऐसा भी अब तक जिसे देखा ही नहीं वक़्त की बेदार संगदिल छलनी क्या कुछ निगल गई कितने आफताब बुझ गए जिन्हे हमने जाना ही नहीं है किसकी ये तलाश ये क्या अधूरा है क्यों है ये तल्खियाँ जाने कब से कैद हूँ इस ख़याल में जो पहले कही था ही नहीं मुसलसल गुज़रती ही रही ज़िन्दगी खामोश लम्हा-बा-लम्हा सफर ही में रहे मंज़िल बगल ही में थी पहचाना ही नहीं। मुकम्मल = perfected/complete बेदार = vigilant/alert संगदिल = ruthless छलनी = filter/funnel आफताब = sun तल्खियाँ = bitterness/sorrows मुसलसल = continually

लोकतंत्र कायम रह जायेगा ।

Democracy is a device that ensures that we shall be governed no better than we deserve. ― George Bernard Shaw जब बेकाबू रोष प्रजा का हो जाएगा शांत मतदाता दंगई बन जाएगा हर नेता इस आग में झुलस जाएगा केवल लोकतंत्र कायम रह जाएगा कमल पर शूल उग जाएगा तिरंगे हाथ में चुभ जाएगा सिंह बूढ़ा व निर्बल हो जाएगा लोकतंत्र कायम रह जाएगा कोई वरदान नहीं जो भविष्य दिखायेगा  न कोई सर्वशक्तिमान उसे बदल पायेगा केवल इतिहास का अध्ययन ये बताएगा  हर हाल में लोकतंत्र कायम रह जाएगा फिर एकरंगी कमल कही खिल जाएगा तिरंगा हाथ फिर बलवान हो जाएगा फिर खूंखार सिंह कोई ज़हर दहाड़ेगा फिर भी लोकतंत्र कायम रह जाएगा फिर नेता प्रजा को निरंतर कुचलेगा फिर मतदाता रोज़गार में उलझेगा फिर मेरा बेटा ये कविता याद करेगा केवल लोकतंत्र कायम रह जाएगा ।।

मेरे बच्चे की माँ

वो लम्हा जब मिरे बच्चे ने माँ पुकारा मुझे मैं एक शाख़ से कितना घना दरख़्त हुई - हुमैरा रहमान तेरी खूबियाँ मेरी खामियों में घुला करती है तेरा होना मुझ अधूरे को पूरा करती है अबके बरस ख़ूब खेलेंगे घर घर हम दोनों कमरों में अब नन्ही किलकारियाँ फिरा करती है बदन में थकन आँखों में वज़न मन में लगन अब एक माँ इस घर में बसेरा करती है खाना पकाना लाड लड़ाना लोरी सुनाना रूठे तो मनाना अगले वक़्त की बेपरवाह लड़की अदा फ़र्ज़ मादरा करती है नहीं थी उम्मीद ज़िन्दगी इस कदर खुशग़वार होगी मेरे बच्चे की माँ मुसल्सल तिलिस्म इख़्तिरा करती है। शाख = branch दरख्त = tree किलकारियां = a child's laughter खुदमुख्तार = free-willed मादरा = maternal/motherly खुशगवार = filled with happiness मुसल्सल = continuously तिलिस्म = magic इख़्तिरा = to invent

Fountainhead - so it begins !!

The idea to start a blog has been manifesting in my mind for quite a while. I put it down to laziness and limited technological advancement of my mind that I was unable to begin this sooner. However, better late than never!!   Why a blog   I am a person of many interests (not necessarily interesting!!) and thus invariably of many beliefs and opinions. Not only am I all of that I also carry a stirring desire to transmit those opinions to my fellow beings. Thus the blog.   Me   31* meandering towards 32* freshly introduced to a. fatherhood (Ayaansh has just opened his innings and is studying the wicket as he prepares to face the first ball) and b. sense of getting old or maturing (depending on the state of mind I wake up in)!!   What went by   Brought up in a half atheist nuclear urban mildly affluent fiercely socialist Hindi speaking Marwari household with the ethos of all men being equal except on account of meritocr...