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Showing posts from 2018

मैं ढूँढता हु जिसको वो माज़ी अब कही नहीं है

मैं ढूँढता हु जिसको वो माज़ी अब कही नहीं है था हमकदम जो वो राही अब कही नहीं है साथ दौड़ती आवारा गली राह तकता खेल का मैदान दोनो मेरे लड़कपन के साथी अब कही नहीं है असातिज़ा ने दिल पर लिक्खा जीने का फलसफा कुछ जगह आज भी है बाकी पर स्याही अब कही नहीं है बरसों बाद लोटा तो शहर बस चुका था मेरे गांव में मैं पहचानता था जिसको वो सादगी अब कही नहीं है माज़ी = past हमकदम = companion असातिज़ा = forefathers फलसफा = philosophy स्याही = ink सादगी = simplicity

मौका भी था दस्तूर भी

उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से कभी गोया किसी में थी ही नहीं - Daag Dehelvi मौका भी था दस्तूर भी धोका भी था कसूर भी की जफ़ा और निभाता रहा अजब है वफ़ा का दस्तूर भी फ़न की नाज़ुकी से बेदार था अपने होने का था ग़ुरूर भी बचपन से बड़ो को सताता था यही लड़कपन बना नासूर भी शख्शियत कमजोर थी ' आकाश ' गैरमामूली होने से था मग़रूर भी । गोया = as if दस्तूर = tradition जफ़ा = being unfaithful फ़न की नाज़ुकी से बेदार = mindful of the shortcomings of own work ग़ुरूर = pride नासूर = chronic/unhealed wound गैरमामूली = unique/unusual मग़रूर = proud/arrogant

गूंजे सदियों तक वो आवाज़ हूँ

गूंजे सदियों तक वो आवाज़ हूँ मैं अपने दौर का इतिहास हूँ है मुझी से शनाख्त इसकी क़यामत तक ये वक़्त लहजा मेरा मैं इसका लिबास हूँ पल भर की शोहरत यहां पल भर में रुसवाई दौर - ए - होशियार का अंजाम दौर - ए - रफ़्तार का आग़ाज़ हूँ बीता लड़कपन हासिल - ए - जहां की तयारी में बेबसी से लबरेज़ आलम का एहसास हूँ गम - ए - रोज़गार के मलबे में धसे हुए ज़माने   ' आकाश ' शायर वो भी रेख्ता का , एजाज़ हूँ । शनाख्त = identification लहजा = articulation रुसवाई = dishonor दौर - ए - होशियार = period of shrewdness दौर - ए - रफ़्तार = period of high tempo हासिल - ए - जहां = winning the world लबरेज़ = overflowing गम - ए - रोज़गार = worries of attaining livelihood रेख्ता = ancient word for Urdu एजाज़ = astonishment