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Showing posts from 2020

फकत ये नोट ही रह जायेंगे क्या

फकत ये नोट ही रह जायेंगे क्या हम और कुछ न कमा पाएंगे क्या आ गई हो तो शामिल क्यों नहीं होती दूर से मेरे जल्वे दिख जाएंगे क्या तर्क - ए - मय की इब्तदा कर तो दी अंजाम से निबाह कर पाएंगे क्या और कितना सब्र बहार आने को गुल - ए - फ़र्दा मुर्जा न जाएंगे क्या रहेंगे याद किस तरह तुमको इस दर्द की दवा कर पाएंगे क्या दिखाई शक्ल मुद्दत से न यारों को उनकी फ़िक्र  से भी उतर जाएंगे क्या निखारा खाक से उठाकर उर्दू मुझे ये कर्ज़े नोटों से चुक   पाएंगे क्या   तर्क - ए - मय =abandonment of liquor इब्तदा = to begin निबाह = carrying on / constancy  गुल - ए - फ़र्दा  = flowers of tomorrow  फ़िक्र = thoughts

अरमां जिनको छूने की हैसियत नहीं थी आज मेरा हाथ चूमते है

अरमां जिनको छूने की हैसियत नहीं थी आज मेरा हाथ चूमते है  क्या वाक़ई इनके काबिल हु मैं हर सुबह ये सवाल पूछते है नया देस है बदला हुआ भेस है नए असरात हो ये लाज़िम है असरात कितने हल्के कितने गहरे हो तय मेरा माज़ी करते है नहीं आसान ख्वाबों को जीना कुछ पाने के लिए कुछ खोना होता है कितना कुछ खोया और आखिर क्या पाया ताउम्र यही सोचते है लिये हाथ में जाम हर एक शाम खास दोस्तो के साथ गुज़रती थी अब जाम खाली है आंगन सूना है फिर मिलने का बहाना ढूंढते हैं

दूसरी ग़ुलामी

हम तो समझे थे सन 47 की आज़ादी सदा के लिये है ये खुशगवारी ये सरदारी सदा के लिये है आगे कि सारी तैयारी सदा के लिये है हम तो समझे थे बीते वक़्त के काले पन्ने पलटा दिये है पांवो में पड़े सलासिल गला दिये है हर अन्ध्यारे कोने में दीप जला दिये है हम तो समझे थे गुलिस्तां रंग बिरंगे फूलो का खिलांएगे हर फूल की यकताई पर इतराएँगे खेत लहलहाएंगे घर आँगन मुस्काएंगे हम तो समझे थे दोराहे पर जो आ पहुंचे कभी मिल बैठ के हल सुझाएंगे  और उस संग चुनी राह पर एक हुजूम की तरह बढ़ते चले जाएंगे हम तो समझे थे एक इक कर सबके घाव भर जाएंगे बदले की आग में जलने से हम बच जाएंगे कुछ बरस तो लगेंगे पर आएगा वो दिन जब एक दूसरे के घर जा आएंगे पर ये हो न सका हाँ ये हो न सका हम ये न समझे थे घाव बरसों नहीं सदियों में भरा करते है आग हलकी ही सही दिल तो उसमे भी जला करते है हम ये न समझे थे  संग चुनी राहों में एक राह ऐसी भी कभी आएगी रहनुमाई को जिसकी हम तरसेंगे आरी और बन्दुक तन जाएगी हम ये न समझे थे कितने ही दीप क्यों न जले बूझकर अँध्यारे में समा जाते है जब भी गलते हैं सलासिल अपने होने का निशाँ छोड़ जाते है हम ये न समझे...