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Showing posts from April, 2019

एक ज़माना था जवान थे हम भी

आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मेरा काम मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे - मिर्ज़ा ग़ालिब एक ज़माना था जवान थे हम भी था एक दौर बज़्म-ए-जान थे हम भी वक़्त ने अधेड़ के रख दिया वगरना हुस्न के ज़लज़लों पर तूफान थे हम भी रोज़ ही लगती थी इश्क़ की बाज़ी रक़ीब की मौत का सामान थे हम भी मत पूछो उस दौर की हकीकत दोस्तो मैदान-ए-इश्क़ के हुक्मरान थे हम भी छिड़ी है बात तो ये एलान-ए-हक़ भी हो सेकड़ो के हासिल-ए-जहान थे हम भी माशूक़-फ़रेबी - deception of the beloved बज़्म-ए-जान - centre of attraction ज़लज़लों - earthquake रक़ीब - opponent, one wying for your beloved मैदान-ए-इश्क़ - battlefield for love हुक्मरान - ruler एलान-ए-हक़ - demanding one's right हासिल-ए-जहान - winning the world