Skip to main content

A dialogue with India - कभी आलोचक कभी कदरदान हूँ मैं - Inspired by Faiz Ahmed Faiz

The test of our progress is not whether we add more to the abundance of those who have much it is whether we provide enough for those who have little.
- Franklin D. Roosevelt 

कभी आलोचक कभी कदरदान हूँ मैं
कैसा रिश्ता है तुझसे मेरा हैरान हूँ मैं

बाप हूँ जिसे फक्र हैं तेरे मन में बसे लोकतंत्र पर
उसी तंत्र से पैदा हुए कपूतों पर हैरान हूँ मैं

माँ हूँ जिसे नाज़ हैं तेज़ी से बढ़ते तेरे कद पर
जिस्म में फैली ग़िज़ायत की कमी पर हैरान हूँ मैं

मुत्मइन औलाद हूँ बिगाड़ा जिसे तेरे लाड ने
देख उसी माँ को करते बच्चों में फर्क हैरान हूँ मैं

बेटी हूँ जो मेहफूस है हर सम्त मौजूद तेरी सेना से
पल पल बेआबरू करते भाइयों पर हैरान हूँ मैं

यार हूँ निसार जो तेरी गलियों पर ऐ वतन
तेरी बेवफाई की लत पर हैरान हूँ मैं

उम्मीदवार हूँ जिसे है यकीन सहर तेरे रुख पर बिखरने को है
सियाह रात कितनी गहरी और तवील है हैरान हूँ मैं।




आलोचक = critic
कदरदान = one who knows value of
कपूत = a bad son
ग़िज़ायत की कमी = malnutrition
मुत्मइन = satisfied
मेहफूस = safe
सम्त = direction
बेआबरू = dishonor
निसार = devoted
उम्मीदवार = optimist
सहर = dawn
रुख = face
सियाह = black
तवील = long

Comments

Popular posts from this blog

मेरे बच्चे की माँ

वो लम्हा जब मिरे बच्चे ने माँ पुकारा मुझे मैं एक शाख़ से कितना घना दरख़्त हुई - हुमैरा रहमान तेरी खूबियाँ मेरी खामियों में घुला करती है तेरा होना मुझ अधूरे को पूरा करती है अबके बरस ख़ूब खेलेंगे घर घर हम दोनों कमरों में अब नन्ही किलकारियाँ फिरा करती है बदन में थकन आँखों में वज़न मन में लगन अब एक माँ इस घर में बसेरा करती है खाना पकाना लाड लड़ाना लोरी सुनाना रूठे तो मनाना अगले वक़्त की बेपरवाह लड़की अदा फ़र्ज़ मादरा करती है नहीं थी उम्मीद ज़िन्दगी इस कदर खुशग़वार होगी मेरे बच्चे की माँ मुसल्सल तिलिस्म इख़्तिरा करती है। शाख = branch दरख्त = tree किलकारियां = a child's laughter खुदमुख्तार = free-willed मादरा = maternal/motherly खुशगवार = filled with happiness मुसल्सल = continuously तिलिस्म = magic इख़्तिरा = to invent

दूसरी ग़ुलामी

हम तो समझे थे सन 47 की आज़ादी सदा के लिये है ये खुशगवारी ये सरदारी सदा के लिये है आगे कि सारी तैयारी सदा के लिये है हम तो समझे थे बीते वक़्त के काले पन्ने पलटा दिये है पांवो में पड़े सलासिल गला दिये है हर अन्ध्यारे कोने में दीप जला दिये है हम तो समझे थे गुलिस्तां रंग बिरंगे फूलो का खिलांएगे हर फूल की यकताई पर इतराएँगे खेत लहलहाएंगे घर आँगन मुस्काएंगे हम तो समझे थे दोराहे पर जो आ पहुंचे कभी मिल बैठ के हल सुझाएंगे  और उस संग चुनी राह पर एक हुजूम की तरह बढ़ते चले जाएंगे हम तो समझे थे एक इक कर सबके घाव भर जाएंगे बदले की आग में जलने से हम बच जाएंगे कुछ बरस तो लगेंगे पर आएगा वो दिन जब एक दूसरे के घर जा आएंगे पर ये हो न सका हाँ ये हो न सका हम ये न समझे थे घाव बरसों नहीं सदियों में भरा करते है आग हलकी ही सही दिल तो उसमे भी जला करते है हम ये न समझे थे  संग चुनी राहों में एक राह ऐसी भी कभी आएगी रहनुमाई को जिसकी हम तरसेंगे आरी और बन्दुक तन जाएगी हम ये न समझे थे कितने ही दीप क्यों न जले बूझकर अँध्यारे में समा जाते है जब भी गलते हैं सलासिल अपने होने का निशाँ छोड़ जाते है हम ये न समझे...

एक ज़माना था जवान थे हम भी

आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मेरा काम मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे - मिर्ज़ा ग़ालिब एक ज़माना था जवान थे हम भी था एक दौर बज़्म-ए-जान थे हम भी वक़्त ने अधेड़ के रख दिया वगरना हुस्न के ज़लज़लों पर तूफान थे हम भी रोज़ ही लगती थी इश्क़ की बाज़ी रक़ीब की मौत का सामान थे हम भी मत पूछो उस दौर की हकीकत दोस्तो मैदान-ए-इश्क़ के हुक्मरान थे हम भी छिड़ी है बात तो ये एलान-ए-हक़ भी हो सेकड़ो के हासिल-ए-जहान थे हम भी माशूक़-फ़रेबी - deception of the beloved बज़्म-ए-जान - centre of attraction ज़लज़लों - earthquake रक़ीब - opponent, one wying for your beloved मैदान-ए-इश्क़ - battlefield for love हुक्मरान - ruler एलान-ए-हक़ - demanding one's right हासिल-ए-जहान - winning the world