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Showing posts from December, 2018

मैं ढूँढता हु जिसको वो माज़ी अब कही नहीं है

मैं ढूँढता हु जिसको वो माज़ी अब कही नहीं है था हमकदम जो वो राही अब कही नहीं है साथ दौड़ती आवारा गली राह तकता खेल का मैदान दोनो मेरे लड़कपन के साथी अब कही नहीं है असातिज़ा ने दिल पर लिक्खा जीने का फलसफा कुछ जगह आज भी है बाकी पर स्याही अब कही नहीं है बरसों बाद लोटा तो शहर बस चुका था मेरे गांव में मैं पहचानता था जिसको वो सादगी अब कही नहीं है माज़ी = past हमकदम = companion असातिज़ा = forefathers फलसफा = philosophy स्याही = ink सादगी = simplicity