The test of our progress is not whether we add more to the abundance of those who have much it is whether we provide enough for those who have little. - Franklin D. Roosevelt कभी आलोचक कभी कदरदान हूँ मैं कैसा रिश्ता है तुझसे मेरा हैरान हूँ मैं बाप हूँ जिसे फक्र हैं तेरे मन में बसे लोकतंत्र पर उसी तंत्र से पैदा हुए कपूतों पर हैरान हूँ मैं माँ हूँ जिसे नाज़ हैं तेज़ी से बढ़ते तेरे कद पर जिस्म में फैली ग़िज़ायत की कमी पर हैरान हूँ मैं मुत्मइन औलाद हूँ बिगाड़ा जिसे तेरे लाड ने देख उसी माँ को करते बच्चों में फर्क हैरान हूँ मैं बेटी हूँ जो मेहफूस है हर सम्त मौजूद तेरी सेना से पल पल बेआबरू करते भाइयों पर हैरान हूँ मैं यार हूँ निसार जो तेरी गलियों पर ऐ वतन तेरी बेवफाई की लत पर हैरान हूँ मैं उम्मीदवार हूँ जिसे है यकीन सहर तेरे रुख पर बिखरने को है सियाह रात कितनी गहरी और तवील है हैरान हूँ मैं। आलोचक = critic कदरदान = one who knows value of कपूत = a bad son ग़िज़ायत की कमी = malnutrition मुत्मइन = satisfied...
My impressions in my words