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जिसकी आरज़ू लेके चले थे ये वो सहर तो नहीं

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़िदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं
- Faiz Ahmed Faiz



जिसकी आरज़ू लेके चले थे ये वो सहर तो नहीं
 है जिसका माज़ी बेहद पुरनूर ये वो शहर तो नहीं

दिल की ज़रखैज़ ज़मीन बरसों से बंजर है
घुल गया रगों में लहू के साथ ज़हर तो नहीं

आज फिर मौलवी परचम लेके निकले है
अगली नस्लों पे था इन्ही का असर तो नहीं

बरसों बाद वो एक ज़ख्म आज भी दहकता है
मरहम लगाने में रह गई बाकी कोई कसर तो नहीं

खाने को हवा रहने को सड़क ओढ़ने को 'आकाश'
सारा जहाँ हमारा हो ये वो डगर तो नहीं।



दाग़ = Freckle

शब-गज़िदा = Injured by night

सहर = Dawn

माज़ी = Past

पुरनूर = Filled with light

ज़रखैज़ = Fertile

मौलवी = Religious scholars

परचम = Flag

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