गुज़रा जिस मोहल्ले में मेरे बाप का बचपन
नाम है उसका लोहारों की गली
खेला करते थे उसी गली के चबूतरों पर
मैं और नन्हा अली
हर्षोल्लास से मनाये है कई त्यौहार
कभी ईदी कभी होली
हो हिन्दू या मुसलमा दीप जले हर घर
हर दिवाली
अंदर आ न पाइ कभी कोई गाड़ी
इतनी पतली है वो गली
किराये की साइकिल पर ही फिरा करते थे
में और नन्हा अली
हर तीसरे दिन सुबहो आता था पानी
मचती थी खलबली
सर्द हफ़्तों में दो चार बार ही नहाते थे
क्या किरोड़ीमल क्या मिर्ज़ा अली
पीठ से पीठ टिकाये हर घर
बरसो से खड़ा था
गर्म रातों में छत ही पर
सारा मोहल्ला सोता था
किराणे की थी बस एक ही दुकान
दुकान के ऊपर ही था जुगल का मकान
वही पर मिला करते थे डबल रोटी और
काजू बादाम
पूरी गली में एक ही टेलीफोन हुआ करता था
और टीवी आने को था
स्कूटर लूना मोटरसाइकिल आ चुके थे
और व्यव्हार में उदारपन सदियों से था
भाटा कुल्फी बेचने हर दोपहर
कुल्फीवाला आता था
यकीं है मुझे गली ख़त्म होने से पहले
उसका ठेला खाली हो जाता था
नए ब्याहे जोड़े को छत पर बना
एकांतमय कमरा दे दिया जाता था
पर देर रात छतो पर ज़रा भी अंजानी आहट हो
सारा मोहल्ला चोर चोर चिल्लाता था
अब वो गली बूढ़ी हो गयी है
जिसकी मेहफ़ूज़ बाहों ने बरसों सब को
एक बराबर समेटा था
शायद तमाम बेटे अब परदेस में रहते है
शायद सभी बेटियां विदा हो चुकी है
शायद कुछ बच्चें अब भी होंगे
मुझे नहीं मालूम
दरअसल आना जाना बहुत कम हो गया है
अब लोहारों की गली में
जहा मेरा भी कुछ बचपन गुज़रा था।
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