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Showing posts from 2019

असल में

कलम घस रहे है हम गुमान है बदल रहे है हम असल में हाथ मल रहे है हम हिन्दू मुसलमान के झगड़े गोरक्षा गोशाला के झगड़े देश प्रेम देश द्रोह के झगड़े इनमें बेसूद उलझ रहे है हम असल में हाथ मल रहे है हम मुफ़लिसों के सपने बिखर गए प्यास से शहर के शहर उजड़ गए फ़ाको से बच्चे बेमौत मर गए मौज मस्ती में मर रहे है हम असल में हाथ मल रहे है हम है ही नहीं मुम्किन कि न आये जो ला सके ले आये अब आएगा तब आएगा जब भी जैसे भी  पर  इंक़लाब आएगा इस आस में मुन्तज़िर - ए - फरदा  बैठे  है हम असल में हाथ मल रहे है हम ओ रिन्दों के शहज़ादे   ज़रा सी ज़हमत करे   घर से निकले आवाज़ उठाए हाथ बढ़ाए सर  फुड़वाए    कुछ तो करे कि  जिससे  अगली नस्लों का कर्ज उतारे कल वो भी न कह दे  की  कलम घस रहे थे हम गुमान  था बदल रहे थे हम असल में...

कोई तो ऐसा निज़ाम पैदा कर

कोई तो ऐसा निज़ाम पैदा कर कि हर बंदे का हक़ अदा कर क्यूं कुछ एक का पैमाना छलके साकी हर एक का गला गीला कर   ढा कहर हर ज़ुल्म मिटा दे या फिर पिला मय मस्जिद में बिठा कर मैं भी तेरी शरण ले लूंगा मौला जातिवाद से हर बंदे को रिहा कर   सब ठीक हो जाएगा मेरे आका तेरी खिदमत से आदम को जुदा कर । निज़ाम = rule / form of government पैमाना = glass of wine कहर = calamity मय = wine जातिवाद = racism आका = Lord खिदमत = service / duty आदम = mankind

एक ज़माना था जवान थे हम भी

आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मेरा काम मजनूँ को बुरा कहती है लैला मिरे आगे - मिर्ज़ा ग़ालिब एक ज़माना था जवान थे हम भी था एक दौर बज़्म-ए-जान थे हम भी वक़्त ने अधेड़ के रख दिया वगरना हुस्न के ज़लज़लों पर तूफान थे हम भी रोज़ ही लगती थी इश्क़ की बाज़ी रक़ीब की मौत का सामान थे हम भी मत पूछो उस दौर की हकीकत दोस्तो मैदान-ए-इश्क़ के हुक्मरान थे हम भी छिड़ी है बात तो ये एलान-ए-हक़ भी हो सेकड़ो के हासिल-ए-जहान थे हम भी माशूक़-फ़रेबी - deception of the beloved बज़्म-ए-जान - centre of attraction ज़लज़लों - earthquake रक़ीब - opponent, one wying for your beloved मैदान-ए-इश्क़ - battlefield for love हुक्मरान - ruler एलान-ए-हक़ - demanding one's right हासिल-ए-जहान - winning the world

मेरे लबों पर बिखरी हुई हँसी हो तुम

मेरे लबों पर बिखरी हुई हँसी हो तुम आके वापस न जानेवाली खुशी हो तुम मुमकिन नहीं सर-ए-राह छोड़ दु तुम्हें  मेरी हमनफस मेरी हमनशीं हो तुम बेशक इस रिश्ते का मैं ही हु कातिल सारे इल्ज़ामों से बाइज़्ज़त बरी हो तुम मेरे बेसबब अफ़साने को मायने दे पुरतरतिब जोड़ती कड़ी हो तुम यू नहीं कि तुझसे हसीं शक्ल नहीं देखी यू कि सब हसीनाओं से बेहद जहीं हो तुम उम्मीद तो थी कि थाम ही लोगी आखिर उम्र में मुझसे कुछ दिन बड़ी हो तुम ।। सर-ए-राह = middle of the road हमनफस = like minded friend हमनशीं = sitting next to you बरी = acquitted बेसबब अफ़साने = meaningless story पुरतरतिब = with perfect arrangement जहीं = intelligent, mature