एक तेरे होने से कई साल तक मैं बड़ा हुआ ही नहीं दो बार गुज़रा वो बचपन जो करोड़ो को मिला ही नहीं बट रहे हैं क्यों धर्मों से इंसान क्यों न बटे कर्मों से इंसान मुकम्मल होगा कभी जहाँ ऐसा भी अब तक जिसे देखा ही नहीं वक़्त की बेदार संगदिल छलनी क्या कुछ निगल गई कितने आफताब बुझ गए जिन्हे हमने जाना ही नहीं है किसकी ये तलाश ये क्या अधूरा है क्यों है ये तल्खियाँ जाने कब से कैद हूँ इस ख़याल में जो पहले कही था ही नहीं मुसलसल गुज़रती ही रही ज़िन्दगी खामोश लम्हा-बा-लम्हा सफर ही में रहे मंज़िल बगल ही में थी पहचाना ही नहीं। मुकम्मल = perfected/complete बेदार = vigilant/alert संगदिल = ruthless छलनी = filter/funnel आफताब = sun तल्खियाँ = bitterness/sorrows मुसलसल = continually
My impressions in my words