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Showing posts from December, 2017

जिसकी आरज़ू लेके चले थे ये वो सहर तो नहीं

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़िदा सहर वो इंतज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं - Faiz Ahmed Faiz जिसकी आरज़ू लेके चले थे ये वो सहर तो नहीं  है जिसका माज़ी बेहद पुरनूर ये वो शहर तो नहीं दिल की ज़रखैज़ ज़मीन बरसों से बंजर है घुल गया रगों में लहू के साथ ज़हर तो नहीं आज फिर मौलवी परचम लेके निकले है अगली नस्लों पे था इन्ही का असर तो नहीं बरसों बाद वो एक ज़ख्म आज भी दहकता है मरहम लगाने में रह गई बाकी कोई कसर तो नहीं खाने को हवा रहने को सड़क ओढ़ने को 'आकाश' सारा जहाँ हमारा हो ये वो डगर तो नहीं। दाग़ = Freckle शब-गज़िदा = Injured by night सहर = Dawn माज़ी = Past पुरनूर = Filled with light ज़रखैज़ = Fertile मौलवी = Religious scholars परचम = Flag