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Showing posts from June, 2019

असल में

कलम घस रहे है हम गुमान है बदल रहे है हम असल में हाथ मल रहे है हम हिन्दू मुसलमान के झगड़े गोरक्षा गोशाला के झगड़े देश प्रेम देश द्रोह के झगड़े इनमें बेसूद उलझ रहे है हम असल में हाथ मल रहे है हम मुफ़लिसों के सपने बिखर गए प्यास से शहर के शहर उजड़ गए फ़ाको से बच्चे बेमौत मर गए मौज मस्ती में मर रहे है हम असल में हाथ मल रहे है हम है ही नहीं मुम्किन कि न आये जो ला सके ले आये अब आएगा तब आएगा जब भी जैसे भी  पर  इंक़लाब आएगा इस आस में मुन्तज़िर - ए - फरदा  बैठे  है हम असल में हाथ मल रहे है हम ओ रिन्दों के शहज़ादे   ज़रा सी ज़हमत करे   घर से निकले आवाज़ उठाए हाथ बढ़ाए सर  फुड़वाए    कुछ तो करे कि  जिससे  अगली नस्लों का कर्ज उतारे कल वो भी न कह दे  की  कलम घस रहे थे हम गुमान  था बदल रहे थे हम असल में...

कोई तो ऐसा निज़ाम पैदा कर

कोई तो ऐसा निज़ाम पैदा कर कि हर बंदे का हक़ अदा कर क्यूं कुछ एक का पैमाना छलके साकी हर एक का गला गीला कर   ढा कहर हर ज़ुल्म मिटा दे या फिर पिला मय मस्जिद में बिठा कर मैं भी तेरी शरण ले लूंगा मौला जातिवाद से हर बंदे को रिहा कर   सब ठीक हो जाएगा मेरे आका तेरी खिदमत से आदम को जुदा कर । निज़ाम = rule / form of government पैमाना = glass of wine कहर = calamity मय = wine जातिवाद = racism आका = Lord खिदमत = service / duty आदम = mankind