अरमां जिनको छूने की हैसियत नहीं थी आज मेरा हाथ चूमते है क्या वाक़ई इनके काबिल हु मैं हर सुबह ये सवाल पूछते है नया देस है बदला हुआ भेस है नए असरात हो ये लाज़िम है असरात कितने हल्के कितने गहरे हो तय मेरा माज़ी करते है नहीं आसान ख्वाबों को जीना कुछ पाने के लिए कुछ खोना होता है कितना कुछ खोया और आखिर क्या पाया ताउम्र यही सोचते है लिये हाथ में जाम हर एक शाम खास दोस्तो के साथ गुज़रती थी अब जाम खाली है आंगन सूना है फिर मिलने का बहाना ढूंढते हैं
My impressions in my words