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Showing posts from July, 2017

आएंगे टेढ़े मोड़ रास्ते में कई मगर चलना तो होगा

आएंगे टेढ़े मोड़ रास्ते में कई मगर चलना तो होगा जब भी लगेगी ज़माने की   ठोकर संभलना तो होगा तुम नहीं बदलना चाहते न बदलो मगर यह तय   रहे ज़माना बदल रहा है और   हमें भी   बदलना तो होगा हर वक़्त सुनते है किसी की कामयाबी की खबर हमें भी आवारगी भूल खुदको   आज़माना   तो होगा मस्लहत को ढाल बना हम   जवान   तो हो गए लेकिन भोला बचपन जो  क़त्ल  हुआ   उसे तलाशना   तो होगा पर काट   सदियों कैद   रक्खा   पिंजरे   में इक चिड़िया को अब्र पे   बनाया उसने अपना मकान सराहना तो होगा सच है   असीम   ताकत होती है जहाज़ों की मगर बहर में छुपे है सेकड़ो तूफ़ान डरना तो होगा है कब ये मुम्किन   गुलिस्तां के सारे   फूल एकरंगी हो फिर भी है दिलों में क्यों ये ख़्वाहिश   सोचना तो होगा। आवारगी = free thinking मस्लहत = maturity अब्र = cloud असीम = infinite बहर = oc...

लोहारों की गली

गुज़रा जिस मोहल्ले में मेरे बाप का बचपन नाम है उसका लोहारों की गली खेला करते थे उसी गली के चबूतरों पर मैं और नन्हा अली हर्षोल्लास से मनाये है कई त्यौहार कभी ईदी कभी होली हो हिन्दू या मुसलमा दीप जले हर घर हर दिवाली अंदर आ न पाइ कभी कोई गाड़ी इतनी पतली है वो गली किराये की साइकिल पर ही फिरा करते थे में और नन्हा अली हर तीसरे दिन सुबहो आता था पानी मचती थी खलबली सर्द हफ़्तों में दो चार बार ही नहाते थे क्या किरोड़ीमल क्या मिर्ज़ा अली पीठ से पीठ टिकाये हर घर बरसो से खड़ा था गर्म रातों में छत ही पर सारा मोहल्ला सोता था किराणे की थी बस एक ही दुकान दुकान के ऊपर ही था जुगल का मकान वही पर मिला करते थे डबल रोटी और काजू बादाम पूरी गली में एक ही टेलीफोन हुआ करता था और टीवी आने को था स्कूटर लूना मोटरसाइकिल आ चुके थे और व्यव्हार में उदारपन सदियों से था भाटा कुल्फी बेचने हर दोपहर कुल्फीवाला आता था यकीं है मुझे गली ख़त्म होने से पहले उसका ठेला खाली हो जाता था नए ब्याहे जोड़े को छत पर बना एकांतमय कमरा दे दिया जा...