उनके बेशुमार तरफ़दारो से
उनके खेमे के पहरेदारों से
उनकी झूठी उथली बातों से
उनकी सोची समझी चालों से
जब तक बन पड़े लड़ेंगे हम
देर-ओ-हरम के ठेकेदारों से
पाप पुण्य के जागीरदारों से
ज़ुल्मत बेचते दुकानदारों से
आप बन बैठे परवर्दिगारों से
जब तक बन पड़े लड़ेंगे हम
ये जीत या हार की बात नहीं है
ये बात मनवाने की बात नहीं है
ये बात से बात चलाने की बात नहीं है
गौर से देखो तो बात सिर्फ इतनी है
वो नफरतों का बाग़ है
और हम
मोहोब्बतों का गुलाब है |
बेशुमार : innumerable
उथली : shallow
देर-ओ-हरम : temple and mosque
ज़ुल्मत : darkness; ignorance
कभी इकबाल ने लिखा था
ReplyDeleteमजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
पर ये बैर ही सिखाता है
बहुत मुश्किल है इनके नफरतें के बाग में
मोहब्बतों के गुलाब खिलाना।
बहुत ही सटिक रचना
Totally agree. Thanks for your comment & appreciation !
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