फकत ये नोट ही रह जायेंगे क्या
हम और कुछ न कमा पाएंगे क्या
आ गई हो तो शामिल क्यों नहीं होती
दूर से मेरे जल्वे दिख जाएंगे क्या
तर्क-ए-मय की इब्तदा कर तो दी
अंजाम से निबाह कर पाएंगे क्या
और कितना सब्र बहार आने को
गुल-ए-फ़र्दा मुर्जा न जाएंगे क्या
रहेंगे याद किस तरह तुमको
इस दर्द की दवा कर पाएंगे क्या
दिखाई शक्ल मुद्दत से न यारों को
उनकी फ़िक्र से भी उतर जाएंगे क्या
निखारा खाक से उठाकर उर्दू मुझे
ये कर्ज़े नोटों से चुक पाएंगे क्या
तर्क-ए-मय =abandonment of liquor
इब्तदा = to begin
निबाह = carrying on / constancy
गुल-ए-फ़र्दा = flowers of tomorrow
फ़िक्र = thoughts
Lovely
ReplyDeleteThanks Ankur. As always, most encouraging !
Deleteदूर से मेरे जलवे दिख जायेंगे क्या
ReplyDeleteबहुत ही उम्दा
Many thanks !
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