अरमां जिनको छूने की हैसियत नहीं थी आज मेरा हाथ चूमते है
क्या वाक़ई इनके काबिल हु मैं हर सुबह ये सवाल पूछते है
नया देस है बदला हुआ भेस है नए असरात हो ये लाज़िम है
असरात कितने हल्के कितने गहरे हो तय मेरा माज़ी करते है
नहीं आसान ख्वाबों को जीना कुछ पाने के लिए कुछ खोना होता है
कितना कुछ खोया और आखिर क्या पाया ताउम्र यही सोचते है
लिये हाथ में जाम हर एक शाम खास दोस्तो के साथ गुज़रती थी
अब जाम खाली है आंगन सूना है फिर मिलने का बहाना ढूंढते हैं
नए देस में लिखी ,पहली तहरीर
ReplyDeleteमुबारक
पुराना छूट जाए,ऐसा मुमकिन नहीं,
नए से मोहब्बत होने में वक्त तो लगता है।
Thanks bhua
Deleteअच्छी ग़ज़ल
ReplyDeleteThanks for the appreciation !
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