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दूसरी ग़ुलामी

हम तो समझे थे

सन 47 की आज़ादी सदा के लिये है
ये खुशगवारी ये सरदारी सदा के लिये है
आगे कि सारी तैयारी सदा के लिये है

हम तो समझे थे

बीते वक़्त के काले पन्ने पलटा दिये है
पांवो में पड़े सलासिल गला दिये है
हर अन्ध्यारे कोने में दीप जला दिये है

हम तो समझे थे

गुलिस्तां रंग बिरंगे फूलो का खिलांएगे
हर फूल की यकताई पर इतराएँगे
खेत लहलहाएंगे घर आँगन मुस्काएंगे

हम तो समझे थे

दोराहे पर जो आ पहुंचे कभी
मिल बैठ के हल सुझाएंगे 
और उस संग चुनी राह पर
एक हुजूम की तरह बढ़ते चले जाएंगे

हम तो समझे थे

एक इक कर सबके घाव भर जाएंगे
बदले की आग में जलने से हम बच जाएंगे
कुछ बरस तो लगेंगे पर आएगा वो दिन
जब एक दूसरे के घर जा आएंगे

पर ये हो न सका
हाँ ये हो न सका

हम ये न समझे थे

घाव बरसों नहीं सदियों में भरा करते है
आग हलकी ही सही
दिल तो उसमे भी जला करते है

हम ये न समझे थे 

संग चुनी राहों में
एक राह ऐसी भी कभी आएगी
रहनुमाई को जिसकी हम तरसेंगे
आरी और बन्दुक तन जाएगी

हम ये न समझे थे

कितने ही दीप क्यों न जले
बूझकर अँध्यारे में समा जाते है
जब भी गलते हैं सलासिल
अपने होने का निशाँ छोड़ जाते है

हम ये न समझे थे

रंग बिरंगे ही सही पर बोये जो बबूल
आँगन आखिर लहू से भर जाएंगे
हर फूल अपना रंग दिखायेगा
गुलिस्तां गहरे काले हो जाएंगे

हम ये न समझे थे

पहली आज़ादी का हासिल ही सरदारी है
ये किसी की जागीर नहीं भारी जिम्मेदारी है
हमें दूसरी ग़ुलामी की ओर ले जा रही
मेरे सरदार की तरतीबवारी है।

खुशगवारी = happiness
सरदारी = leadership/right to self govern
सलासिल = chains
गुलिस्तां = garden
यकताई = uniqueness
इतराएँगे = feel proud
दोराहे = intersection
हुजूम = sea of people/crowd
रहनुमाई = control/charge
आरी = sword
बबूल = cactus
जागीर = fiefdom / birth right
तरतीबवारी = meticulous arrangement

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