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मैं ढूँढता हु जिसको वो माज़ी अब कही नहीं है


मैं ढूँढता हु जिसको वो माज़ी अब कही नहीं है
था हमकदम जो वो राही अब कही नहीं है

साथ दौड़ती आवारा गली राह तकता खेल का मैदान
दोनो मेरे लड़कपन के साथी अब कही नहीं है


असातिज़ा ने दिल पर लिक्खा जीने का फलसफा
कुछ जगह आज भी है बाकी पर स्याही अब कही नहीं है


बरसों बाद लोटा तो शहर बस चुका था मेरे गांव में
मैं पहचानता था जिसको वो सादगी अब कही नहीं है


माज़ी = past
हमकदम = companion
असातिज़ा = forefathers
फलसफा = philosophy
स्याही = ink
सादगी = simplicity

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